क्षितिज देखे हैं सपने आसमान से पर्वत पर चढ़ जाना है कठिन परिश्रम से हमको कुछ करके दिखलाना है गिर जाएँ जब कदम-कदम पर दृढ़ निश्च्य कर उठ जाना है चाहें कितनी कठिन हो राहें उज्वल भविष्य बनाना है दिखे न कुछ मंजिल के सिवा आखों में उसको बसना है कर सदुपयोग आज समय का अब आगे बढ़ते जाना है फीकी पड़ जाए सूरज की तपिश इतना खुद को तपना है चमक भी सोने से ज्यादा क्षितिज को छू जाना है ।। |