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This poem is on Space shuttle |
| उडते पंक्षी को देख, उठा सवाल मन में एक हॅ खुशनसीब कितने ये परींदे, दोनो जहां को पल में देख लेते. पर नहीं की हॅ खुदा ने भी नाइंसाफी, दी उन्हें उडने की शक्ति , तो दी हॅ हमें दिमागी शक्ति. क्यों न बनाएं हम खुद ही अपने पंख्, सोच समझकर बनाया हमने Space Shuttle. उड सके जो इन परींदों से भी अनंत, छु ले जो दुसरी दुनिया का आसमान, उडे बनकर हकीकत हर अरमान्. माना हुईं हमसे गलतियां कईं, पर हर कमी से मिली सीख नई. माना हुए हम पहली कोशिश में नाकाम, हो गया तबाह Challenger, रह गया वो space के अंदर, खोज ही उनकी बन गया खंजर. फिर भेजा गया Columbia यान्, हो गयी शहीद जिसमें , भारत की बेटी कल्पना चावला. सितारों ने जिनके थे कदम चुमे, पांव न रख पाये वे ही जमीं पे. करते रहे कोशिश यही कि, मिलेगी सफलता कभी न कभी. उम्मीद सफलता की जगाकर, बनाया Discovery , Atlantis , ऑर Endeavour. आखिर मिल ही गयी हमें मंजिल्, छु लिया दोनो जहां हमने. पा लिया अपना मुकाम्, कर दिया साबित अपना दिमाग्. ठान लें जो सच्चे मन से, करें मेहनत जी तोड उसी पे. फिर कॅसे न चुमे कदम सफलता, होता हॅ मेहनत का फल मीठा. राजश्री राजभर् |